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Saturday, February 7, 2015

Ramayan in Rock Paintings

Rock paintings repeated Ramayana
The story is told through a language that only understand who know the language, but the story in pictures is rupayit can understand it all. Possibly that is why several of the sites on South-East Asia shilachitron is an expression of the ramkatha hosted. In many countries there is a description of the shilachitra series ramcharit. Prambanan and java's panatran them, Jetuvan of ankarevat of kampuchitra and Thailand sanctuary names are remarkable. Located in the lush green of the adorable Java field known as the Antiquities of Chandi pramvanan sevu noted. It is also called chandi larajongarang. This campus consists of 235 Temple magnavshesh. Its square courtyard panktivaddh from North to South in the central part of three temples. Is the Shiva temple in the middle. Siva Temple of Brahma and Vishnu temples in the South. Shiva and Brahma Temple RAM Katha and shilachitra Vishnu Temple are Krishna Leela. 

Chandi larajongarang build temples of skilled In the second half of the ninth century by Prince called was developed. Prambanan temples at 1549E. Eruption of the Merapi volcano around considerably damaged. They are buried under the lava of the volcano by centuries. 1885E by the Archaeology Department of yogyakarta. The excavation was started. Then again, His remains were to be surprised at seeing people. Three hundred years became a Muslim people to worship at the Temple had to race with the Sun lighting crafted. This event, stealing from the French passenger eyewitness Joule also worship Hindu temple was seen.1 Department of Archeology of Indonesia 1919E. In prambanan temple complex with undivided reduce huge pagoda located completed scientific method introduced. This task has many European scholars have collaborated as active. In 1953E. It sadDoable tasks completed. It really can be said 

puratattva marvel of engineering. Yathasthan the shilachitron Ramayana inside it has been installed. German scholar-turned-villain has studied these Ramayana sturhaim shilachitron. In the Shiva temple of prambanan ramkatha hosted 42 and Brahma Temple in the 30 Rock pictures. Thus 72 has the entire RAM Katha rupayit shilachitron here.2 shilachitron of prambanan engraved in many of the RAM Katha etc poet at sites vary. These SITA haran on the back door of the demon Ravana while vehicles from Lay the ring by SITA travel, jatayu, levee construction time fish ingest the stones, cut the ear of Ravana at the Durbar angad go etc are not in the Valmiki Ramayana context. Are some of the pictures in this huge series where interpreters has to go the same way antak, the Mahabharata's understanding of drishtikuton diameter lipikar pen rokni had. Shilachitron set of four hundred prambanan years later rock of craft in East Java in panatran RAM is an expression of the narrative. Chandi panatran blatter district near mount ketul Chambers is located in the foothills of the South-West. Here surrounded by a circular wall around the Shiva temple which is on the West side of the main gate. The construction of the mother of Prince 

majpahit lineage in 1347E rajatva jayvishnuvardhani humbucker. Was completed in But it had an earlier start was the emperor. Chandi RAM panatran rock legend 106 pictures.3 which of the following to display the main form of Hanuman is mighty. This is from the Sinhalese and Hanuman to get started kumbhakarn after the death of the narrative ends. Shilachitra of Hindu prambanan-javani is engraved, in style While panatran is a complete shilashilp of javani. These painted vasrabhushan and asra-shasra also shapes the characters with Japanese-style effect. Ankorvat Temple located at campo Emperor suryavarman II (1112-53E.) took place in the rajatvakal. The force of the Emperor in the temple corridor-women of Heaven-Hell, manthan dev-demon war, Mahabharata, There are many associated with the Ramayana harivansh Rai and shilachitra. Here is a very brief narrative in rupayit RAM shilachitron. These series of Ravana shilachitron slaughter of adoration by the gods for begins with. Then SITA swayamvar scene. The presentation of these two major events of balkand after Leipzig paper yesterday spoke and the keg has been depicting the slaughter. Next shilachitra Golden deer bow RAM-invectives appear, runners behind. Then there is the view of the friendship of the RAM from sugreev. Again, Vali and sugreev's dvendva war is portrayed. All shilachitron in the presence of Hanuman, Rama in Ashok parterre-Ravana war, SITA RAM Ayodhya ordeal and return of scene.4 ankorvat of shilachitron rupayit in RAM is extremely sparse and brief narrative though, however it is important, Because of its presentation has been a professional adikavya. Also important in Thailand shilachitron RAM narrative space. Thailand's capital of Bangkok court complex on the southern edge of Wat-Po or jetuvan is the kindergarten. 152 shilapton marble in its initiation on RAM Katha pictures are passed. J. m. "in his book" the romanic pictures of cadets and their study has been done. This treatise is divided into nine sections to the shilachitron have been doing their analysis-1. SITA-haran, (2) travel (3) Sri Lanka Hanuman Lanka Dahan, (iv) eviction, vibhishan (5) pseudo SITA case, bridge construction (6), (7) Lanka Serv
शिला चित्रों में रुपादित रामायण
जो कथा किसी भाषा के माध्यम से कही जाती है, उसे उस भाषा के जानने वाले ही समझ पाते हैं, किंतु जो कथा चित्रों में रुपायित होती है, उसे सब समझ सकते हैं। संभवत: इसी कारण दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक स्थलों पर शिलाचित्रों में रामकथा की अभिव्यक्ति हुई है। कई देशों में शिलाचित्र श्रृंखलाओं में रामचरित का वर्णन हुआ है। उनमें जवा के प्रम्बनान तथा पनातरान, कंपूचित्रा के अंकारेवाट और थाईलैंड के जेतुवन विहार के नाम उल्लेखनीय हैं। जावा के हरे-भरे मनमोहक मैदान में अवस्थित प्रम्वनान का पुरावशेष चंडी सेवू के नाम से विख्यात है। इसे चंड़ी लाराजोंगरांग भी कहा जाता है। इस परिसर में २३५ मंदिर के मग्नावशेष हैं। इसके वर्गाकार आंगन के मध्य भाग में उत्तर से दक्षिण पंक्तिवद्ध तीन मंदिर हैं। बीच में शिव मंदिर है। शिव मंदिर के उत्तर ब्रह्मा तथा दक्षिण में विष्णु मंदिर हैं। शिव और ब्रह्मा मंदिर में राम कथा और विष्णु मंदिर में कृष्ण लीला के शिलाचित्र हैं। चंडी लाराजोंगरंग के मंदिरों का निर्माण दक्ष नामक राजकुमार ने नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में करवाया था। प्रम्बनान के मंदिरों को १५४९ई. के आस-पास मेरापी ज्वालामुखी के विस्फोट में काफी क्षति पहुँची। वे सदियों तक ज्वालामुखी के लावा के नीचे दबे रहे। योग्यकार्टा के पुरातत्व विभाग द्वारा १८८५ई. में उसकी खुदाई शुरु हुई। फिर तो, उसके अवशेष को देख कर लोग अचंभित हो गये। तीन सौ वर्षों से मुसलमान बने लोग मंदिर में धूप-दीप लेकर पूजा अर्चना करने दौड़ पड़े। इस घटना का चश्मदीद गवाह फ्रांसीसी यात्री जूल ने हाजियों को भी हिंदू मंदिर में पूजा करते देखा था।१ इंडोनेशिया के पुरातत्व विभाग ने १९१९ई. में पूरे मनोयोग के साथ प्रम्बनान मंदिर परिसर स्थित विशाल शिवालय के पुनर्निमाण का कार्य पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति से आरंभ किया। इस कार्य में अनेक यूरोपीय विद्वानों ने सक्रिय रुप से सहयोग किया। सन् १९५३ई. में यह दु:साध्य कार्य पूरा हुआ। इसे वास्तव में पुरातत्त्व अभियंत्रण का चमत्कार ही कहा जा सकता है। इसके अंदर रामायण शिलाचित्रों को यथास्थान स्थापित कर दिया गया है। जर्मन विद्वान विलेन स्टूरहाइम ने इन रामायण शिलाचित्रों का अध्ययन किया है। प्रम्बनान के शिव मंदिर में रामकथा के ४२ और ब्रह्मा मंदिर में ३० शिला चित्र हैं। इस प्रकार ७२ शिलाचित्रों में यहाँ संपूर्ण राम कथा रुपायित हुई है।२ प्रम्बनान के शिलाचित्रों में उत्कीर्ण राम कथा में आदि कवि की रचना से अनेक स्थलों पर भिन्नता है। इनमें सीता हरण के समय रावण द्वार दानव की पीठ पर स्थापित यान से यात्रा करना, सीता द्वारा जटायु को अंगूठी देना, सेतु निर्माण के समय मछलियों द्वारा पत्थरों को निगलना, रावण के दरबार में अंगद का कान काटा जाना आदि प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं हैं। इस विशाल श्रृंखला में कुछ चित्र ऐसे भी हैं जहाँ व्याख्याकारों को उसी प्रकार अंटक जाना पड़ता है, जिस प्रकार महाभारत के लिपीकार को व्यास के दृष्टिकूटों को समझने के लिए कलम रोकनी पड़ती थी। प्रम्बनान के शिलाचित्रों की स्थापना के चार सौ वर्ष बाद पूर्वी जावा में पनातरान के शिला शिल्प में पुन: राम कथा की अभिव्यक्ति हुई है। चंडी पनातरान ब्लीटार जिला में केतुल पर्वत के पास दक्षिण-पश्चिम की तलहटी में स्थित है। यहाँ चारों ओर से वृत्ताकार दीवार से घिरा एक शिव मंदिर है जिसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। इसका निर्माण कार्य मजपहित वंश के राजकुमार हयमबुरुक की माता जयविष्णुवर्धनी के राजत्व काल में १३४७ई. में पूरा हुआ था, किंतु इसका आरंभ किसी पूर्ववर्ती सम्राट ने ही किया था। चंडी पनातरान में राम कथा के १०६ शिला चित्र है।३ इनमें मुख्य रुप से हनुमान के पराक्रम को प्रदर्शित किया गया है। इसका आरंभ हनुमान के लंका प्रवेश से हुआ है और कुंभकर्ण की मृत्यु के बाद यहाँ की कथा समाप्त हो जाती है। प्रम्बनान के शिलाचित्र हिंदू-जावानी शैली में उत्कीर्ण है, जबकि पनातरान का शिलाशिल्प पूरी तरह जावानी है। इनमें चित्रित वस्राभूषण तथा अस्र-शस्र के साथ पात्रों की आकृतियों पर भी जापानी शैली का प्रभाव है। कंपूचिया स्थित अंकोरवाट मंदिर का निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (१११२-५३ई.) के राजत्वकाल में हुआ था। इस मंदिर के गलियारे में तत्कालीन सम्राट के बल-वैमन का साथ स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश तथा रामायण से संबद्ध अनेक शिलाचित्र हैं। यहाँ के शिलाचित्रों में रुपायित राम कथा बहुत संक्षिप्त है। इन शिलाचित्रों की श्रृंखला रावण वध हेतु देवताओं द्वारा की गयी आराधना से आरंभ होती है। उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है। बालकांड की इन दो प्रमुख घटनाओं की प्रस्तुति के बाद विराध एवं कबंध वध का चित्रण हुआ है। अगले शिलाचित्र में राम धनुष-बाण लिए स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसके उपरांत सुग्रीव से राम की मैत्री का दृश्य है। फिर, वालि और सुग्रीव के द्वेंद्व युद्ध का चित्रण हुआ है। परवर्ती शिलाचित्रों में अशोक वाटिका में हनुमान की उपस्थिति, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं।४ अंकोरवाट के शिलाचित्रों में रुपायित राम कथा यद्यपि अत्यधिक विरल और संक्षिप्त है, तथापि यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी प्रस्तुति आदिकाव्य की कथा के अनुरुप हुई है। राम कथा के शिलाचित्रों में थाईलैंड का भी महत्वपूर्ण स्थान है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक के राजभवन परिसर के दक्षिणी किनारे पर वाट-पो या जेतुवन विहार है। इसके दीक्षा कक्ष में संगमरमर के १५२ शिलापटों पर राम कथा के चित्र उत्तीर्ण हैं। जे.एम. कैडेट की पुस्तक 'रामकियेन' में उनके चित्र हैं और उनका अध्ययन भी किया गया है। इस ग्रंथ में उन शिलाचित्रों को नौ खंडों में विभाजित कर उनका विश्लेषण किया गया है- (१) सीता-हरण, (२) हनुमान की लंका यात्रा, (३) लंका दहन, (४) विभीषण निष्कासन, (५) छद्म सीता प्रकरण, (६) सेतु निर्माण, (७) लंका सर्वेक्षण, (९) कुंभकर्ण तथा इंद्रजीत वध और (९) अंतिम युद्ध। दक्षिण-पूर्व एशिया के रामायण शिलाचित्रों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत में वैष्णव और शैव विचारों का समन्वय की प्रवृत्ति मध्यकाल में विकसित होते है, जबकि इस क्षेत्र में इस परंपरा का आरंभ प्रम्बनान के शिवालय से ही हो जाता है जिसकी तिथि नौवीं शताब्दी है। इसके साथ ही यहाँ वैष्णव और शैव के साथ बौद्ध आस्था का भी समन्वय हुआ है।

Thursday, February 13, 2014

Satyamev Jayate: How the truth won over Secular and waqf deception-AYODHYA PART 4.

Continue from Ayodhya after partition secular lies -PART 3.

demolition, JNU, anti-hindu, Secular, waqf deception, haksar, Nurul Hasan, marxist, IBTL

Secularists’ lies and unscathed Truth - In the winter of 2002-2003, the Court had secretly ordered a search of the site with a ground-penetrating radar by the company Tojo Vikas International Ltd., which had gained fame with its role in the construction of the Delhi underground railway. Canadian geophysicist Claude Robillard concluded from the scans that “there is some structure under the mosque” (, 19 March 2003). In early 2003, the Court ordered the ASI to start excavations and either confirm or disprove the provisional conclusions of the radar scan. Strictly speaking, the existence of the medieval temple had already been proven by a wealth of documentary and archaeological evidence. It was only because of the brutal denial of the evidence by a group of vocal academics and allied politicians that the Court considered it wiser to come up with a new and as yet unchallenged type of evidence. The archaeologists were permanently scrutinized by archaeologists and historians employed by the Muslim parties. Moreover, many of the excavators were Muslims, unlikely to be willing accomplices in a pro-Hindu manipulation. According to the Press Trust of India (11 June 2003): “There were 131 labourers including 29 Muslims engaged in the digging work today”. All this was done to ensure truth from being manipulated.

In the months when the digging took place, the newspapers reported new findings once in a while. Thus, “an ancient stone inscription in the Dev Nagari script and a foundation were discovered in the ongoing excavation in the acquired land in Ayodhya today”, while “stone pieces and a wall were found in other trenches” and “a human figure in terracotta, sand stone netting, decorated sand stone in three pieces were found in one trench” (The Hindu, 5 May 2003). Following this, a Babri Masjid supporter, Naved Yar Khan, approached the Supreme Court with a petition to prohibit all archaeological digging at the contentious site which was rejected (“SC rejects plea against excavation”, The Hindu, 10 June 2003). The secularists had always opposed archaeological fact-finding at the site, arguing that this would open a Pandora’s box of similar initiatives at the literally thousands of mosque sites where temples used to stand.

  • On June 11, after the ASI had been registering new findings for months, pseudo-secularist newspapers started spreading absolute lies that nothing had been found: “ASI finds no proof of structure below Babri Masjid: report”, claimed the Times of India. The occasion was the ASI’s filing of an interim report, yet none of these papers quoted the report, only “sources”. In interviews of Hindu or Muslim leaders, questions were opened with a reference that “nothing was found” underneath the Babri Masjid. However, RSS website came up with detailed findings of the ASI report. There, on 24 June 2003, Chetan Merani wrote: “The excavations so far give ample traces that there was a mammoth pre-existing structure beneath the three-domed Babri structure. (…) The bricks used in these perimeters predate the time of Babar. (…) More than 30 pillar bases have been found at equal spans. (...) Beautiful stone pieces bearing carved Hindu ornamentations like lotus, kaustubh jewel, alligator facade, etc., have been used in these walls. (…) An octagonal holy fireplace (yajna kund) has been found. (…) Terracotta idols of divine figurines, serpent, elephant, horse-rider, saints, etc., have been found. (…) The excavation gives out the picture of a vast compound housing a sole distinguished and greatly celebrated structure used for divine purposes.”

    The pseudo-secularist effort had been very strenuous. By contrast, the VHP took a very lackadaisical attitude towards the excavations. It had never attached too much importance to the history debate, firstly because it was a false and contrived debate about a demolished temple which all honest observers knew to have existed; and secondly because the Hindu claim to the site rested less on past history than on the continuous and present fact that Hindus consider the disputed site as a sacred site today. The VHP knew perfectly well that the excavations were bringing up more confirmation by the day of the existence of the temple. And all this while, the Marxist hate campaign targetted the ASI, a scientific institution, as much as it targetted the VHP.

    For those unfamiliar with modern Indian history: the Marxists were handed a near-monopoly on institutional power in India’s academic and educational sector by Indira Gandhi involved in an intra-Congress power struggle when she needed the help of the Left. Her confidants P.N. Haksar and Nurul Hasan packed the institutions with Marxists. When, during the Emergency dictatorship (1975-77), her Communist Party allies threatened to become too powerful, she removed them from key political positions but left the Marxists’ hold on the cultural sector intact. They at once set out to falsify history and propagate their own version through the official textbooks. After coming to power in 1998, the BJP-dominated government made a half-hearted attempt to bring transparency at least in the history textbooks. This led the Marxists to start a furious hate campaign against the so-called “saffronization” of history.

    In spite of a very aggressive campaign of lies by a few spearheads of “secularism”, the broad outline of the true story was in the public domain for anyone with the curiosity to find out. Yet, the International media’s reporting on the interim report consisted exclusively in copying the most mendacious version. The Reuters despatch for 11 June 2003 was titled: “Dig finds no sign of temple at Indian holy site”, quoting not the actual report, but a ‘source’. Like a babe in the wood, the world press never thought of taking a critical look at the secularist version. The BBC News titled: “‘No sign’ of Ayodhya temple” (11 June 2003). Here again, no information from the horse’s mouth, only from “widespread reports across the Indian media”. Distorted or even totally false reporting on communally sensitive issues is a well-entrenched feature of Indian journalism. No reporter or columnist or editor ever gets fired or formally reprimanded or even just criticized by his peers for smearing Hindu nationalists. And foreign correspondents used to trusting their Indian secularist sources have likewise developed a habit of swallowing and relaying highly distorted news stories.

    Satyamev Jayate - In the Ayodhya case, for two decades, the secularists had worked hard to keep the lid on the evidence and they didn’t want some puny radar scanner or muddy-handed archaeologist to bring the facts to light and thereby expose their mendaciousness. After all the wild claims made about their findings, the experts themselves had finally spoken. Their report confirmed that the disputed site contains the foundations of a large building complex. And this time too, the religious purpose of the building can be inferred from the numerous religious artefacts found in between the pillar-bases.

    In a normal setting, the ASI findings should have finished once and for all the campaign of history denial by the Marxists and their Muslim camp followers. But the world of Indian secularism is a fantasy-land where hard facts don’t count for much. Like spoilt children, the secularists are used to having it all their own way, and when reality interferes, they close their eyes, shut off their ears and refuse to know. And they will lie and cheat in order to prevent others from knowing. The secularists claimed that the existence of the temple became part of Hindu rhetoric in the dialogue process begun in 1989 between the All India Babri Mosque Committee and the hard-line Vishwa Hindu Parishad (VHP). In reality, the existence of the medieval temple was a matter of long-standing consensus. What became part of someone’s rhetoric towards 1989 was its denial, launched by the secularists and picked up by the Muslims.

    The irresponsible and downright evil campaign of history denial by the secularist opinion-makers has prolonged the Ayodhya dispute by at least a decade. Denouncing all pragmatic deals, these secular fundamentalists insisted on having it their way for the full 100%, meaning the total humiliation of the Hindus. They exercised verbal terror against Rajiv Gandhi, Narasimha Rao and all politicians suspected of wanting to compromise with the Hindu movement, making them postpone the needed steps towards the solution. This way, they exacerbated the tensions in return for the pleasure of indulging their self-image as implacable secularists. A real secularist would have sought to minimize a religious conflict, but this lot insisted on magnifying it and turning it into a national crisis. For them, it was a holy war, a jihad, just as it was for their Islamist pupils and paymasters. So, the blood of all the people killed in Ayodhya-related riots from 1989 onwards is at least partly on their heads.

    But now, the historical evidence has definitively been verified. After every single historical and archaeological investigation had confirmed the old consensus, the secularists have now been defeated in the final test. The deceit turns out to be their own. Their lies stand exposed and recorded for all to see. Their strategy to sabotage peace and justice in Ayodhya was based on history falsification. With all the blood on their hands, they have disgraced the fair name of secularism. Henceforth, India should be kind enough to ignore them except to hear the confession of their sins. Ideas have consequences, and so do lies. Before the “eminent historians” and other militant secularists are called up to purgatory, they would do well to clear their conscience by offering restitution to the scientists and Hindus they have smeared. And by begging forgiveness from the families of the Hindu and Muslim victims of riots triggered by a controversy that could have been old history already by 1989, had there not been the secularist obstruction.

    On 30th September 2010, the three judge bench of Allahabad High Court delivered its landmark judgment. All the 3 judges agreed to the fact that there indeed was a “Hindu religious structure” below the disputed Babari mosque. Justice Aftab Alam did not concede that the temple was demolished to construct the mosque. He maintained that the mosque was constructed on the ruins of the temple. Justice Dharmveer Sharma and Justice Sudhir Agrawal ruled that the mosque was constructed after demolishing the temple and using its material. Justice Agrawal and Justicee Aftab Alam ruled for the division of the disputed site giving 2/3rd to the Hindus and still giving 1/3rd to Muslims, while Justice Sharma ruled that all land must go to Hindus. Justice Sharma retired the same day with a unique track record under his cap - none of his judgments, when challenged in the Supreme Court, were ever turned down, i.e. whatever Justice Sharma ruled, was always upheld by the Supreme Court. Interestingly enough, the concerned parties challenged the decision of the Allahabad High Court in the Supreme Court. The Supreme Court, in its hearing on May 9th, termed the decision of splitting the land into 3 parts given by Justice Agrawal and Justice Khan as ‘surprising’ and stayed it, making it amply clear that the land will only go to one party, seemingly resonating with Justice Sharma’s observations.

    A patient India and Hindus across the world waits for the final verdict. Ram has ruled Indian and Hindu psyche since time immemorial, and the importance of Ayodhya can never be erased. For an Indian Muslim, they need to be told the fact that their brothers in Ayodhya themselves never went to offer a namaz at Babri mosque since 1934, a fact that a ‘secular’ media and wicked politicians deliberately hid from them, disturbing the peace. Like every nationalist peace loving Indian, IBTL too hopes for a quick and just settlement of the dispute and a feeling of comity prevail, through Ayodhya, across India, and India could truly become a Ramrajya of peace and development.
    Disclaimer: The information presented in this series has been primarily taken from the documentary on Ram Janmbhoomi researched and scripted by Vivek Apte and the book “Ayodyha, The Finale: Science versus Secularism the Excavations Debate” by Dr. Koenraad Elst, an eminent Dutch Indologist. IBTL values Secularism but denounces its abuse as a tool to suppress truth and create tensions among countrymen. IBTL holds nationalism and foremost, Truth as most sacred and revered.

    Saturday, January 18, 2014

    भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण

     श्री राम से जुडे कुछ अहम् सबुत पेश हैं........
    जिसे पढ़ के नास्तिक भी सोच में पड जायेंगे की रामायण सच्ची हैं या काल्पनिक-

    भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण 

    पुराने उपलब्ध प्रमाणों और राम अवतार जी के शोध और अनुशंधानों के अनुसार कुल १९५ स्थानों पर राम और सीता जी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं जिन्हें ५ भागों में वर्णित कर रहा हूँ
    • वनवास का प्रथम चरण गंगा का अंचल 

    1. सबसे पहले राम जी अयोध्या से चलकर तमसा नदी (गौराघाट,फैजाबाद,उत्तर प्रदेश) को पार किया जो अयोध्या से २० किमी की दूरी पर है |
    2. आगे बढ़ते हुए राम जी ने गोमती नदी को पर किया और श्रिंगवेरपुर (वर्त्तमान सिंगरोर,जिला इलाहाबाद )पहुंचे …आगे 2 किलोमीटर पर गंगा जी थीं और यहाँ से सुमंत को राम जी ने वापस कर दिया |
    3. बस यही जगह केवट प्रसंग के लिए प्रसिद्ध है |
    4. इसके बाद यमुना नदी को संगम के निकट पार कर के राम जी चित्रकूट में प्रवेश करते हैं|
    5. वाल्मीकि आश्रम,मंडव्य आश्रम,भारत कूप आज भी इन प्रसंगों की गाथा का गान कर रहे हैं |
    6. भारत मिलाप के बाद राम जी का चित्रकूट से प्रस्थान ,भारत चरण पादुका लेकर अयोध्या जी वापस |
    7. अगला पड़ाव श्री अत्रि मुनि का आश्रम
    • बनवास का द्वितीय चरण दंडक वन (दंडकारन्य)

    1. घने जंगलों और बरसात वाले जीवन को जीते हुए राम जी सीता और लक्षमण सहित सरभंग और सुतीक्षण मुनि के आश्रमों में पहुचते हैं |
    2. नर्मदा और महानदी के अंचल में उन्होंने अपना ज्यादा जीवन बिताया ,पन्ना ,रायपुर,बस्तर और जगदलपुर में
    3. तमाम जंगलों ,झीलों पहाड़ों और नदियों को पारकर राम जी अगस्त्य मुनि के आश्रम नाशिक पहुँचते हैं |
    4. जहाँ उन्हें अगस्त्य मुनि, अग्निशाला में बनाये हुए अपने अशत्र शस्त्र प्रदान करते हैं |
    • वनवास का तृतीय चरण गोदावरी अंचल

    1. अगस्त्य मुनि से मिलन के पश्चात राम जी पंचवटी (पांच वट वृक्षों से घिरा क्षेत्र ) जो आज भी नाशिक में गोदावरी के तट पर है यहाँ अपना निवास स्थान बनाये |यहीं आपने तड़का ,खर और दूषण का वध किया |
    2. यही वो “जनस्थान” है जो वाल्मीकि रामायण में कहा गया है …आज भी स्थित है नाशिक में
    3. जहाँ मारीच का वध हुआ वह स्थान मृग व्यघेश्वर और बानेश्वर नाम से आज भी मौजूद है नाशिक में |
    4. इसके बाद ही सीता हरण हुआ ….जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पार हुई जो इगतपुरी तालुका नाशिक के ताकीद गाँव में मौजूद है |दूरी ५६ किमी नाशिक से |
    इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया क्यों की यहीं पर मरणसन्न जटायु ने बताया था की सम्राट दशरथ की मृत्यु हो गई है ...और राम जी ने यहाँ जटायु का अंतिम संस्कार कर के पिता और जटायु का श्राद्ध तर्पण किया था |यद्यपि भारत ने भी अयोध्या में किया था श्राद्ध ,मानस में प्रसंग है "भरत किन्ही दस्गात्र विधाना "
    • वनवास का चतुर्थ चरण तुंगभद्रा और कावेरी के अंचल में 

    1. सीता की तलाश में राम लक्षमण जटायु मिलन और कबंध बाहुछेद कर के ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढे ….|
    2. रास्ते में पंपा सरोवर के पास शबरी से मुलाकात हुई और नवधा भक्ति से शबरी को मुक्ति मिली |जो आज कल बेलगाँव का सुरेवन का इलाका है और आज भी ये बेर के कटीले वृक्षों के लिए ही प्रसिद्ध है |
    3. चन्दन के जंगलों को पार कर राम जी ऋष्यमूक की ओर बढ़ते हुए हनुमान और सुग्रीव से मिले ,सीता के आभूषण प्राप्त हुए और बाली का वध हुआ ….ये स्थान आज भी कर्णाटक के बेल्लारी के हम्पी में स्थित है |
    • बनवास का पंचम चरण समुद्र का अंचल

    1. कावेरी नदी के किनारे चलते ,चन्दन के वनों को पार करते कोड्डीकराई पहुचे पर पुनः पुल के निर्माण हेतु रामेश्वर आये जिसके हर प्रमाण छेदुकराई में उपलब्ध है |सागर तट के तीन दिनों तक अन्वेषण और शोध के बाद राम जी ने कोड्डीकराई और छेदुकराई को छोड़ सागर पर पुल निर्माण की सबसे उत्तम स्थिति रामेश्वरम की पाई ….और चौथे दिन इंजिनियर नल और नील ने पुल बंधन का कार्य प्रारम्भ किया |